कहानियाँ


शुभचिंतन

परमानन्द श्रीवास्तव, 28 सितम्बर 2018

यह उन दिनों की बात है जब हम सतना में रहते थे. तब मेरी उम्र पच्चीस के आस-पास रही होगी. हमारी मकान-मालकिन मिश्राइन जी, गोरी-चिट्टी, अच्छे क़द-काठी की, लगभग पचास-पचपन वर्ष की एक दबंग महिला थीं. मकान किराये पर लेने के लिए मुझे उनसे ही बात करनी पड़ी थी.

शुरू-शुरू में उनकी वेश-भूषा के कारण, और बहुत दिनों तक उनके श्रीमान जी से मुलाक़ात न होने के कारण, मुझे लगा कि वह विधवा हैं. लेकिन जब मुझे पता चला कि मेरा अनुमान ग़लत है, तो अपनी सोच पर बहुत अफ़सोस हुआ.

मिश्रा जी सरकारी नौकरी में थे, और उनके रिटायर होने में अभी कुछ समय बाक़ी था. उनका व्यक्तित्व अपनी पत्नी से बिलकुल विपरीत था. साँवले, दुबले-पतले, शान्त, और कुछ दब्बू से. जब दोनों साथ में होते तो ऐसा लगता जैसे एक ख़ूँख़ार शेरनी के साथ डरा-सहमा सा कोई बकरा खड़ा हो.

कभी-कभी जब मैं उनके घर में होता तो देखता था कि  मिश्राइन जी की दहाड़,”मिश्रा जी महाराज, सुनते हो”, के जवाब में मिश्रा जी हाज़िर हो जाते, एक डरे-सहमे बच्चे की तरह.

जो घर हमें किराये पर दिया गया था, वह उनके बड़े से घर के पिछली तरफ़ के एक कोने का हिस्सा था, और यह उनके आँगन का भी कोना था. आँगन के उसी कोने के एक हिस्से को घेर कर हमारे लिये भी आँगन निकाल दिया गया था. अवस्था कुछ ऐसी थी कि उनके घर में चलने वाली बातचीत कई बार हमें सुनाई देती थीं, विशेष रूप से मिश्राइन जी की दहाड़. और ऐसे ही, शायद, हमारी बातें भी उन्हें सुनाई देती होंगी.

मिश्राइन जी को कभी कोई बात हम तक पहुँचानी होती थी, तो वह ज़्यादा कष्ट नहीं करती थीं. अपने आँगन के साथ वाले बरामदे से ही आवाज़ दे देती थीं, “राजू बेटे, ज़रा आना तो.”

और फिर मुझे बाहर से घूमकर, उनके घर, उनकी बात सुनने के लिये जाना पड़ता था.

उनके चार बच्चों में सब के सब सतना से बाहर रहते थे, और मिश्रा जी अक्सर टूर पर. मिश्राइन जी दिन भर आस-पड़ोस के घरों में घूम-घूम कर पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन करती-करवाती रहती थीं. उनके घर में भी आये दिन कभी तुलसी-विवाह होता था, तो कभी राम जी की झाँकी सजती थी. इन सब बातों से हमें, वह काफ़ी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला लगती थीं.

हमारे इस विश्वास को तब और भी बल मिलता था, जब मिश्रा जी को फटकार लगाती उनकी दहाड़ सुनाई पड़ती, “मिश्रा जी महाराज, अब तो भगवान में चित्त लगाओ, सांसारिक प्रवृत्तियों को छोड़कर.”

लेकिन अपने पति को दी जाने वाली उनकी सलाह की गूढ़ता का पता चलने में मुझे कई दशक लग गये.

इस गूढ़ सलाह का भेद मुझपर कुछ-कुछ तब खुला, जब मैं ख़ुद उम्र के उस दौर में पहुँचा, और मुझे अपनी पत्नीश्री से ऐसी ही सलाह मिलने लगी. उम्र के इस दौर में मुझे अपनी पत्नीश्री से अक्सर फटकार मिल जाती, “देख रही हूँ, उम्र बढ़ने के साथ आपका दिमाग़ कुछ ज़्यादा ख़राब होता जा रहा है. सब कुछ छोड़ कर अब भगवद्भजन में अपना दिल लगाना शुरू करिए.”

फिर मुझे पता चला कि उम्र के इस दौर में अपने देश के लगभग हर पति को अपनी पत्नी से यह सलाह ज़रूर मिलती है, उन कुछ एक बेचारों को छोड़कर जिनकी दूसरी, तीसरी, चौथी या पाँचवीं पत्नी है, या फिर जिन पति-पत्नी के बीच उम्र का अन्तर ज़्यादा है. शायद अन्य देशों में भी कुछ ऐसा ही होता हो, उनके रस्मो-रिवाज के अनुसार कुछ अलग शब्दों में, पर उनके बारे में मुझे कुछ ज़्यादा मालूम नहीं.

‘भगवान में चित्त लगाने’ की इस सलाह की गूढ़ता का मुझे कुछ-कुछ ही पता चला था उस समय. सलाह के पीछे छिपी ‘शुभचिंतन’ को पूरी तरह समझने में मुझे कुछ और वर्ष लग गए.

अस्सी के दशक के मध्य तक  टेलिविज़न सिर्फ़ कुछ बड़े शहरों तक सीमित न रहकर, छोटे शहरों और क़स्बों तक पहुँच गया था. तब से लेकर दशक के अंत तक लोगों के मन-मस्तिष्क पर दूरदर्शन के प्रोग्राम छाये रहे. ये प्रोग्राम, मेरे विचार से, अच्छे स्तर के होते थे. अगर संयोगवश कभी कहीं कोई घटिया प्रोग्राम आया भी होगा तो उसे अपवाद ही मानना चाहिए.

लेकिन नब्बे का दशक आते-आते बहुत सारे चैनल आ गये. यह अलग बात है कि उनके कई प्रोग्राम के स्तर पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे. नए चैनल की बाढ़ में दूरदर्शन डूबने लगा. यह सरकारी प्रतिष्ठान उनके मार्केटिंग की मार को न तो झेल सका और न ही उससे उबरने का रास्ता ढूँढ पाया.

नब्बे के दशक में ही किसी समय, मैंने टेलिविज़न पर हिंदी सीरियल देखना लगभग छोड़ दिया है, क्योंकि उनमें से ज़्यादातर मुझे  बहुत घटिया स्तर के लगते हैं. दूरदर्शन के पुराने दिनों के सीमित एपिसोड के उलट, आज के सीरियल को सालों खींचा जाता है, कहानी में बेतुके मोड़ लाकर. इस तरह की उलटी-सीधी कहानियों को झेलना मेरे वश की बात नहीं रही.

लेकिन मेरी धर्मपत्नी काफ़ी बहादुर है. वीरांगना है वह तो. टीवी से चिपक कर ऐसे बेसिरपैर के विभिन्न सीरियल को बड़े प्यार से झेलती है.

मैं रात में घर में ही रहता हूँ, उन बहुत सारे निकम्मे पतियों की तरह जिन्हें रात में घर के बाहर कोई काम नहीं सूझता. और, जब मैं घर में रहता हूँ  तो अपनी पत्नीश्री के इर्द-गिर्द मँड़राता रहता हूँ. ऐसे में मेरी नज़र भी कभी-कभी टीवी पर पड़ ही जाती है. भले ही अगले पल अफ़सोस होता हो कि मैंने ये क्या किया.

लेकिन मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि उस दिन मैं टीवी के सामने था, और मेरे ज्ञान-चक्षु खुलने का अवसर मिला.

बिग बॉस सीज़न 12 का ओपनिंग एपिसोड था. इस सीज़न में हर प्रतिस्पर्धी को जोड़े में आना था, कोई अकेला भाग नहीं ले सकता था. उम्र के सातवीं दशक में पदार्पण कर चुके प्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा का आगमन एक सुन्दर बाला के साथ प्रतिस्पर्धी के रूप में हुआ. प्रतिस्पर्धी गुरु-शिष्या की इस जोड़ी की आकर्षक कन्या ने स्टेज पर आते ही संसार को यह भी बता दिया कि पिछले तीन साल से उनके निकट-सम्बंध (रिलेशनशिप) रहे हैं.

मेरे जड़ बुद्धि को अब जाकर पता चला कि भगवद्भजन में कितनी शक्ति होती है. यदि सिर्फ़ व्यावसायिक तौर पर भजन गाने से जलोटा जी के जीवन में इतनी सुंदर कन्या का प्रवेश हुआ है, तब तो ‘भगवान में चित्त लगाने’ वाले को उर्वशी या रम्भा का मिलना निश्चित ही है. 

अब जाकर मुझपर यह भेद खुला कि मेरे जैसे उम्र वालों की पत्नियाँ अपने पतियों की कितनी महान शुभचिन्तक हैं. इन पत्नियों के इतने बड़े शुभचिन्तन को आज तक कोई पति समझ ही नहीं पाया. अपने नालायकियत  की आदत से मजबूर ये सारे पति, अपनी पत्नियों के इस शुभचिंतन को नज़रन्दाज करते हुए इसमें उनका स्वार्थ ढूँढते हैं. 

इसी तरह की सोच वाले मेरे एक मित्र का विचार है कि ये सारी पत्नियाँ अपने बूढ़े पतियों को झेलने से बचने के लिए उनको भगवान में चित्त लगाने की सलाह देती हैं. लेकिन उनकी यह सोच कितनी द्वेषपूर्ण है, यह तो आप भी समझ सकते हैं.

जो पत्नियाँ पूरे जीवन अपने पति की मंगलकामना के लिये कजरी-तीज, करवा-चौथ, और जाने क्या-क्या, कठिन और कठिनतर, व्रत-उपवास करती रहती हैं, वो अपने पति के जीवन-संध्या को सुखद बनाने के लिए अगर मेनका, रम्भा और उर्वशी के आगमन की कामना करें तो भला इसमें अचरज की क्या बात है.

इसीलिये, अपनी पत्नीश्री के आदेश का पालन करते हुए, अब मैं दिन के आठों पहर भगवान में चित्त लगाये रहता हूँ. मेरे अन्दर अचानक से आये इस परिवर्तन से मेरी पत्नीश्री शायद कुछ अचम्भित सी हैं, लेकिन काफ़ी आश्वस्त भी. उनके चेहरे पर ख़ुशी शायद इस बात से है कि मैं सुधर गया हूँ, और उन्हें यह भरोसा हो गया है कि मेरी जीवन संध्या अब मेनका, रम्भा या उर्वशी के साथ अच्छी बीत सकेगी.

इस लेख के द्वारा मैं पूरे देश के अपने हमउम्र सारे पतियों को ऐसा ही करने की सलाह देना चाहता हूँ.

 मुझे मालूम है कि मेरा वह नालायक दोस्त मेरी इस बात को नहीं मानेगा और बोलेगा, “गधे, तेरी बीवी इस लिए खुश है कि उसे अब तुझे झेलना नहीं पड़ता.” वह नकारात्मक सोच वाला जो ठहरा.

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