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शुभचिंतन

गृहस्थ आश्रम के छिपे रहस्य

अगर आप जानना चाहें….

लिखने का शौक़ तो बचपन से ही रहा है। उनमे से कुछ-एक रचनायें सत्तर के दशक में किन्ही पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। लेकिन, अपने देश में अभिरुचि को आजीविका बनाना बहुधा ही कठिन होता आया है, इसलिए मैं भी इंजीनियर बन बैठा। एक बार नौकरी में घुसा तो अभिरुचि पीछे, कहीं बहुत पीछे, रह गयी। उसके लिए समय निकाल पाना सम्भव ही न रहा। सेवा-निवृत्ति के बाद जब मेरे बच्चों ने एक बार फिर से लेखन के लिए प्रोत्साहित किया तो दिल में शंका थी कि क्या यह सम्भव हो सकेगा, इतने लम्बे अंतराल के बाद. स्वांत: सुखाय शुरू तो किया है, लेकिन अगर इन कृतियों में से कोई किसी के दिल को छू सके, या फिर कोई दूसरी किसी को गुदगुदा सके, या ये सारे अगर किसी को सिर्फ़ पसंद ही आ सकें, तो मैं इसे अपनी एक उपलब्धि समझूँगा…….

– परमानन्द श्रीवास्तव

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